प्रख्यात इस्लामिक स्कॉलर पद्मविभूषण मौलाना वहीदुद्दीन खान को खि़राजे अक़ीदत पेश की

सहारनपुर

ऑल इंडिया उर्दू तालिमी बोर्ड के पदाधिकारियों ने गौरी शंकर बाज़ार एक सभागार में इस्लामिक स्कॉलर और जाने-माने लेखक वहीदुद्दीन खान के निधन पर उन्हें खिराजे अक़ीदत पेश की।
ऑल इंडिया उर्दू तालिमी बोर्ड शाखा सहारनपुर के संरक्षक सज्जाद हुसैन एडवोकेट ने बताया कि मौलाना वहीदुद्दीन खां ने कुरआन को समकालीन अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिए भी जाना जाता था। इसके साथ ही, जनवरी 2000 में वहीदुद्दीन खान को भारत का तीसरा सर्वाेच्च अवॉर्ड पद्म भूषण से उन्हें नवाज़ा गया। उसके बाद उन्हें मदर टेरेसा की तरफ से नेशनल सिटिज़नस अवॉर्ड, और साल 2009 में राजीव गांधी नेशनल सद्भावना पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें जनवरी 2021 में मौलाना कल्बे सादिक साहब के साथ मौलाना वहीदुद्दीन साहब को भी भारत के दूसरे सर्वाेच्च पुरस्कार पद्मविभूषण से भी नवाजा गया था। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के बधरिया गांव में 1 जनवरी साल 1925 को पैदा हुए वहीदुद्दीन खान कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के अवॉर्ड से नवाज़ा जा चुका है। पूर्व सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल के संरक्षण में उन्हें डेम्यर्जस पीस इंटरनेशनल अवार्ड दिया गया।बोर्ड के महासचिव दानिश सिद्दीकी ने मौलाना के विचारों सराहना करते हुए कहा कि मौलाना पर आरएसएस और भाजपा के करीबी होने का हमेशा लगता रहा आरोप। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मौलाना वहीदुद्दीन खान एक काबिल शख्स थे और उनकी काबिलियत उनके लेखों/तहरीरों से भी बयां होती थी। लेकिन यह भी अपनी जगह कड़वी सच्चाई है कि मौलाना वहीदुद्दीन खान में तमाम काबिलियत होने के बावजूद भी समाज में उनका काफी विरोध इस बात को लेकर  रहा कि वह आरएसएस और भाजपा की जबान बोलते हैं या फिर उनके ज्यादा करीबी रहे हैं। हालांकि इसके जवाब में मौलाना वहीदुद्दीन खान स्पष्ट रूप से यह कहते थे कि मुझे तो राजीव गांधी सद्भावना अवार्ड भी दिया गया लेकिन तब किसी ने मुझे कांग्रेस का करीबी नहीं कहा लोग पता नहीं इस तरह की बातें कहां से ले आते हैं कि मैं आरएसएस और भाजपा का करीबी हूं जबकि मैं सिर्फ बातचीत का दामन कभी नहीं छोड़ता और ऐसा करके मैं अपने मज़हब के नियमों पर ही अमल करता हूं क्यूंकि बातचीत से ही बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान निकल सकता है। मौलाना वहीदुद्दीन खान ने कभी कलम का दामन नहीं छोड़ा आखिरी समय तक भी वो लिखते रहे उनके द्वारा संपादित अलरिसाला पत्रिका काफी पसंद की जाती है। जो कई राज्यों की लाइब्रेरी यो में मौजूद है। मौलाना से जब इस बारे में पूछा जाता था कि आप इतनी उम्र होने के बावजूद भी इतना लिखते हैं और अमन और शांति की बातें लगातार करते हैं और अपनी ओर से अमन और भाईचारे के लिए प्रयास भी खूब करते रहते थे। मौलाना वहीदुद्दीन खां ने कलम का साथ कभी नहीं छोड़ा और अमन भाईचारे के पैगाम पर खूब लिखते रहे। हमारी नई पीढ़ी को भी ऐसे ज़िदादिल इंसानों के बताए मार्ग पर चलना चाहिए। ख्वाजा सलमान नासरी ने कहा कि मौलाना वहीदुद्दीन खान तीन तलाक के विरोध में भी हमेशा आवाज़ बुलंद करते रहे और जब यह मामला ख़ूब सुर्खियों में रहा था तब भी वह तीन तलाक के विरोध में अपनी बात रखते रहे। मौलाना वहीदुद्दीन खान ने जहां कई किताबें लिखी वही वह विभिन्न अखबारों में भी समय-समय पर लेख लिखते रहे जिन को काफी पसंद किया जाता रहा तो कुछ बातें मौलाना वहीदुद्दीन खान की लोगों को पसंद भी नहीं आई और उनके ही समाज के लोगों की ओर से उनकी कुछ बातों पर एतराज़ जताया गया। मौलाना वहीदुद्दीन खान के जाने से जो क्षति हुई है उसकी भरपाई निकट भविष्य में काफ़ी मुश्किल है। बोर्ड के समस्त पदाधिकारियों व सदस्यों ने मौलाना को के लिए दुआये मगफिरत की व मुल्क में फैला कोरोना  वायरस के ख़ात्मे के लिए दुआ की। इस अवसर पर जमाल जमाली, जुनैद सज्जाद, फ़रहत अहमद, राफे सिद्दीकी, अरशद रहमानी, नवेद उल हक़ सिद्दीकी, अली समद, आदि मौजूद रहे।

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