पछुवादून में आस्था और हर्षोल्लास से मनाया गया फूलदेई त्योहार

विकासनगर

फूलदेई त्योहार की रविवार से शुरुआत हो गई है। उत्तराखंड में फूलदेई पर्व की खास मान्यता है। कुमाऊं में इसे फूलदेई के रूप में मनाया जाता है। वहीं गढ़वाल में फूल संक्रांति के तौर मनाया जाता है। बच्चों की आस्था और हर्षोल्लास का त्योहार फूलदेई पछुवादून में भी धूमधाम से मनाया जा रहा है। पछुवादून के ग्रामीण इलाके आज भी पहाड़ की संस्कृति को संजोए हुए है। एक माह तक मनाए जाने वाले इस पर्व के पहले दिन अटकफार्म-तेलपुरा में बच्चों ने जंगल से फूल तोडक़र घरों की देहरी पर रखते हुए पर्व की शुरुआत की। रविवार को सुबह से ही बच्चों ने घर-घर जाकर लोगों की देहरी में फूल चढ़ाए। लोगों ने भी बच्चों को श्रद्धा से गुड़-चावल का प्रसाद दिया। रविवार सुबह फूलदेई के लिए बच्चे चला फुलारी फूलों को, सौदा सौदा फूल बिरौला गीत गाते हुए अपनी टोकरी में खेतों और जंगलों से रंग- बिरंगे फूल चुनकर लाए और ‘फूलदेई छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार, ये देली स बारंबार नमस्कार’ लोकगीत गाते हुए जंगल तोड़े गए फूलों को घरों की देहरी पर रखते हुए सुबह से ही नजर आए।

पौराणिक मान्यता: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव शीतकाल में अपनी तपस्या में लीन थे। ऋतु परिवर्तन के कई वर्ष बीत गए लेकिन, शिव की तंद्रा नहीं टूटी। ऐसे में मां पार्वती नहीं बल्कि नंदी-शिवगण और संसार के कई वर्ष शिव के तंद्रालीन होने से बेमौसमी हो गए। आखिरकार, शिव की तंद्रा तोडऩे के लिए पार्वती ने युक्ति निकाली और शिव भक्तों को पीतांबरी वस्त्र पहनाकर उन्हें अबोध बच्चों का स्वरूप दे दिया। फिर सभी देव क्यारियों में ऐसे पुष्प चुनकर लाए, जिनकी खुशबू पूरे कैलाश में महक उठी। सबसे पहले शिव के तंद्रालीन मुद्रा को अर्पित किए गए, जिसे फूलदेई कहा गया। शिव की तंद्रा टूटी लेकिन, सामने बच्चों के वेश में शिवगणों को देखकर उनका क्रोध शांत हो गया। पहाड़ की संस्कृति के अनुसार, इस दिन हिंदू नववर्ष की शुरूआत भी मानी जाती है। इस वक्त उत्तराखंड के पहाड़ों में अनेक प्रकार के सुंदर और रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं। पूरे पहाड़ का आंचल रंग-बिरंगे फूलों से सजा होता है।

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